साल वन
राज्य के कुल वन क्षेत्र के लगभग 45 प्रतिशत भाग पर है। साल वृक्षों की उंचाई 12 से 30 मीटर तक होती है। लकड़ी कठोर एवं टिकाउ होने के काण रेल्वे स्लीपर बनाने में उपयोगी है । रायगढ़, जशपुर, बिलासपुर, रायपुर, कोरिया, बस्तर, तथा सरगुजा जिलों में साल वनों का विस्तार सर्वाधिक है।
सौगौन वन
बीजापुर, भोपालपट्टनम, कोंटा, अम्बागढ़ चैकी, रायगढ़, सरायपाली, बालोद, तथाना नारायणपुर तहसीलों में इन वनों का सर्वाधिक विस्तार है। सरकार की अनुमति के बिना इन वनों का काटना दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है।
आरक्षित वन
प्रदेश के 39.8 प्रतिशत क्षेत्रफल में आरक्षित वनों का विस्तार है। ये आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें लकड़ी काटने तथा पशु चराने पर प्रतिबन्ध है।
संरक्षित वन
प्रदेश के 48.14 प्रतिशत क्षेत्रफल में संरक्षित वनों का विस्तार है। प्रशासकीय देखरेख में सार्वजनिक सदुपयोग हेतु स्थानीय लोगांे को वनोत्पाद संग्रहण, पशु चराने तथा घरेलू उपयोग हेतु लकड़ी प्राप्त करने की सुविधा दी गई है।
अवर्गीकृत वन
प्रदेश के 11.92 प्रतिशत क्षेत्रफल में ऐसे वनों का विस्तार है। पशु चराने तथा लकड़ी काटने हेतु इस प्रकार के वन खुले रहते हैं। इन्हें ठेके पर भी देने का प्रावधान है।
मिश्रित वन
प्रदेश के कुल वन क्षेत्र के लगभग 80 प्रतिशत भाग में हैं। पर्णपाती, सदाबहार, कंटीले, शुष्क एवं आर्द्र सभी प्रकार के वन हैं। प्रमुख रूप से तेन्दू, बीजा, साजा, हल्दू, सलाई, धौंरा, तिंसा, बेर, आंवला, महुआ, कर्श, कौव्हा, सेमल, खैर, नीम, आम, पीपल, जामुन, बरगद, इमली, बेल, कुसुम, पलाश आदि वृक्ष यहां हैं।
बांस वन
प्रदेश के कुल वनोत्पादों से प्राप्त आय में से 20 प्रतिशत योगदान बांस का है। रायगढ़ जिले के घरघोड़ा, खरसिया, बिलासपुर जिले के लोरमी, कोटा, दुर्ग जिले के बालोद, बस्तर जिले के नारायणपुर, जशपुर जिले के तपकरा, कुंजारा, महासमुंद जिले के सरायपाली तथा सरगुजा जिले के अम्बिकापुर प्रखण्डों में है। अन्य जिलों में भी छोटे-छोटे क्षेत्रों में बांस के वन है। लुग्दी, कागज, घर, टोकरी, सूपा, झाड़ू, टट्टा, गोलर, चटाई आदि बनाने से बहुतायत लोगों को रोजगार मिलता है।
 
वनों का वितरण
बस्तर, दन्तेवाड़ा, सरगुजा, रायपुर जिलों में अधिक वन क्षेत्र है। कोरिया, कोरबा, बिलासपुर, रायगढ़, कवर्धा, जशपुर आदि जिलों में मध्यम वन क्षेत्र 49 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक हैं। निम्न वन क्षेत्र के अन्तर्गत महासमुंद, दुर्ग, राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा, धमतरी आदि जिले सम्मिलित हैं, जहां 40 प्रतिशत से भी कम वन है।
मुख्य वनोपज
इसमें मुख्यतः काष्ठ उत्पाद एवं जलाउ लकड़ी हैं। 13 मुख्य प्रजातियां इमारती लकड़ी की श्रेणी में शामिल हैं, जिसमें 6 राष्ट्रीयकृत प्रजातियां हैं- साल, सागौन, बीजा, साजा, शीशम, और खैर। प्रदेश में प्रतिवर्ष एक लाख 37 हजार 601 घन मीटर इमारती लकड़ी, 2 लाख 15 हजार, 216 चट्टा जलाउ लकड़ी तथा 75 हजार 374 नोशनल यूनिट बांस का औसतन उत्पादन होता हैं।
गौण वनोपज या लघु वनोपज
बांस, तेन्दूपत्ता, इमली, महुआ, गोंद, हर्रा, लाख, चिरौंजी, खैर, बबूल, अंजन, सालबीज, साजा, छाल, धावड़ा, धवई फूल, चरौटा बीज, वनतुलसी, आम गुठली, छींद घास, नागरमोथा, आंवला, चार गुठली, कुसुम बीज, बहेड़ा, बेल आदि। प्रदेश में 20 से 25 लाख मानक बोरा तेन्दूपत्ता, 3 लाख क्विंटल साल बीज, 60 हजार क्विंटल हर्रा का उत्पादन प्रतिवर्ष होता है, अनुमानित मूल्य 250 करोड़ रूपये है। अंराष्ट्रीयकृत लघु वनोपज से लगभग 400 करोड़ रूपये की आय होती है।
 
  • छत्तीसगढ़ राज्य में वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं सवंर्धन हेतु 3 राष्ट्रीय उद्यान तथा 11 वन्य प्राणी अभयारण्य हैं। गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान प्रदेश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है। जहाँ बाघ, तेंदुआ, नीलगाय, गौर, चीतल तथा सांभर आदि पशु बहुतायत में है। विलक्षण जैव विविधता भी राज्य के लिए एक विशिष्ट संसाधन और शक्ति है। यहां खूंखार पशु जैसे- शेर, तेन्दुआ, लकड़बघ्घा आदि के साथ-साथ वनभैंसा, गौर, चीतल, सांभर भी बहुतायत में है।
  • छत्तीसगढ़ राज्य में वन्य प्राणियों के संरक्षण एवं संवध्रन हेतु 3 राष्ट्रीय उद्यान तथा 11 वन प्राणी अभयारण्य हैं।
  • पूर्ववर्ती संजय राष्ट्रीय उद्यान जो म.प्र. के सीधी एवं छत्तीसगढ़ के सरगुजा एवं कोरिया जिलों में फैला था, उसके छत्तीसगढ़ स्थित क्षेत्रों को मिलाकर यह नया राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया है।
  • कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान है।
  • इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान प्रदेश का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान है, जहां बाघ परियोजना संचालित है।
  • सीतानदी अभयारण्य प्रदेश का सबसे पुराना तथा भोरमदेव अभयारण्य नवीनतम अभयारण्य है।
  • तमोर पिंगला क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा तथा बादलखोर क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे छोटा अभयारण्य है।