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छत्तीसगढ़:गौरवशाली इतिहास
छत्तीसगढ़ राज्य मध्यप्रदेश के पूर्व में 17 अंश-23.7 अंश उत्तर अक्षांश तथा 80.40-83.38 अंश पूर्व देशांतर के मध्य में स्थित है। छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर में सतपुड़ा का उच्चतम भूभाग है। मध्य में महानदी तथा उसकी सहायक नदियों का मैदानी भाग है तथा इसके दक्षिण में बस्तर का विस्तृत पठार है। राज्य की उत्तर दिशा में उत्तर प्रदेश, उत्तर-पूर्व में झारखंड, पूर्व में उड़ीसा, दक्षिण-पूर्व तथा दक्षिण में आंध्रप्रदेश, दक्षिण-पश्चिम में महाराष्ट्र एवं पश्चिम में मध्यप्रदेश के बालाघाट तथा मण्डला जिले तथा उत्तर-पश्चिम में सीधी जिला छत्तीसगढ़ की सीमा निर्धारित करते हैं। इस तरह छत्तसगढ़ 6 राज्यों से घिरा हुआ है।

राज्य का कुल क्षेत्रफल 1,35,361 वर्ग किलोमीटर है। छत्तीसगढ़ में 27 राजस्व जिल, 2 पुलिस जिले, 146 विकासखंड, 146 तहसीले, 229 राजस्व निरीक्षक मंडल, 4,906 पटवारी हल्के, 19,774 राजस्व गांव, जिसमें से 19,291 आबाद गांव, 483 वीरान गांव, 425 वनगांव हैं। यहां नगरीय निकायों की संख्या 163 है। 16 जिला पंचायतें, 146 जनपद पंचायतें तथा 9,820 ग्राम पंचायतें हैं।
 
गौरवशाली इतिहास
छत्तीसगढ़ का पहला ऐतिहासिक उल्लेख कोसल के रूप में रामायण में मिलता है । इसके अनुसार भगवान श्रीराम की माता कौशल्या कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री थी । भानुमंत का कोई पुत्र नही होने के कारण राजा दशरथ को कोसल का भी राज्य मिला । छत्तीसगढ़ के कई स्थानों का संबंध रामायण से जोड़ा जाता है । मान्यता है कि शिवरीनारायण में ही शबरी के जूठे बेर भगवान श्रीराम ने खाये थे। यह भी माना जाता है कि श्रीराम ने वनवास का लंबा समय छत्तीसगढ़ के जंगलों में व्यतीत किया। महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी यहीं था। सीता निर्वासित होकर यहीं आयीं, इसी धरती पर उन्होने लव और कुश को जन्म दिया।
 
महाभारत में छत्तीसगढ़ का उल्लेख प्राक्कोसल नाम से हुआ है। इस काल में राजा मोरध्वज और ताम्रध्वज का शासन था। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार अर्जुन ने इस पर विजय पायी थी। बाद में इस प्रदेश पर अर्जुन के पुत्र बब्रूवाहन ने राज किया और सिरपुर में अपनी राजधानी स्थापित की। ईसा से 600 साल पूर्व के क्रमबद्ध, भारत के प्रमाणिक इतिहास में उल्लेखित 16 महाजनपदों में इस जनपद कोसल अर्थात छत्तीसगढ़ था। भगवान बुद्ध के छत्तीसगढ़ आने के भी प्रमाण उपलब्ध हैं। दुनिया को जानने के लिए विश्व यात्रा पर निकले प्रसिद्ध चीनी यात्री व्हेनसांग के भी सिरपुर आने के प्रमाण हैं।
 
सरगुजा जिले से प्राप्त मौर्यकालीन अभिलेख में देवदासी सुतनुका और देवदत्त के प्रेम का उल्लेख है।इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार छत्तीसगढ़ के अलग-अलग क्षेत्रों में कई स्थानी राजवंशों शासन के प्रमाण मिलते हैं। यहां राज्य करने वाले प्रमुख राजवंशों में वाकाटकों की एक शाखा के साथ नल, राजर्षितुल्य, शरभपुरी, पांडु, बाण और सोमवंश प्रमुख हैं।
 
कैसे पड़ा नाम : छत्तीसगढ़
माना जाता है कि छत्तीसगढ़ का नामकरण इस क्षेत्र में 36 गढ़ों के स्थित होने के आधार पर हुआ। रायपुर जिले के गजेटियर (1973) के अनुसार इनमें से 18 किले शिवनाथ नदी के दक्षिण अर्थात् रायपुर राज्य के अंतर्गत स्थित हैं। शेष 18 गढ़ शिवनाथ नदी के उत्तर में रतनपुर राज्य के अंतर्गत हैं। जिन 36 किलों के यहां स्थित होने के आधार पर इस प्रदेश का नाम छत्तीसगढ़ पड़ा वे इस प्रकार हैं - इस अन्य मान्यता के अनुसार छत्तीसगढ़ शब्द चेदिस गढ़ का अपभ्रंश है जो कि इस क्षेत्र के कई वर्षों तक चेदिस राजाओं के आधिपत्य में रहने के कारण उत्पन्न हुआ। रायपुर गजेटियर (1909) में श्री ए.ई. नेल्सन ने इस बात का उल्लेख किया है। इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि रामायण, महाभारत तथा वैदिक ग्रंथों में प्रयुक्त कोसल, दक्षिण कोसल तथा प्राक्कोसल इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
 
छत्तीसगढ़ के इतिहास में कलचुरि राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान है। इस वंश के राजा अपने को चंद्रवंशी तथा सहस्रार्जुन की संतान मानते थे।
 
प्राचीन इतिहास के अनुसार छत्तीसगढ़ में कलचुरि साम्राज्य 1000 ईस्वी के आसपास स्थापित हुआ, जब राजा कलिंगराज ने यहां का शासन संभालने के लिए तम्माण में अपनी राजधानी बनाई। कलिंगराज के पौत्र रतनदेव प्रथम ने शासन संभालने के बाद रतनपुर में राजधानी स्थापित की।
 
इस राजवंश के 1525 ईस्वी तक बने रहने के प्रमाण मिलते हैं। इसी राजवंश की एक अन्य शाखा द्वारा छत्तीसगढ़ में सन् 1750 तक राज करने के भी प्रमाण हैं।
मुगल काल में छत्तीसगढ़ पर साय वंश के शासन का इतिहास भी मिलता है। कल्याण साय नामक राजा ने सन् 1536 से 1573 तक यहां शासन किया, उसकी राजधानी रतनपुर थी। वह अकबर और जहांगीर के समकालीन था। कल्याण साय के बाद इस वंश ने सन् 1750 तक राज्य किया। कुल इतिहासकार साय वंश को रतनपुर शाखा के कलचुरि मानते हैं।
कलचुरि राजवंश के पराभव के साथ ही 1750 में छत्तीसगढ पर मराठा भोंसलों का राज्य कायम हुआ। नागपुर के राजा के प्रतिनिधि के रूम में बिम्बाजी ने सन् 1758 में राज्य की व्यवस्था संभाली। बिम्बाजी के बाद मराठों का कोई उल्लेखनीय राजा या प्रतिनिधि छत्तीसगढ़ में नहीं रहा। 27 नवम्बर 1817 में नागपुर में अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध में मराठों की पराजय हुई और यह क्षेत्र अंग्रेजों के आधिपत्य में आ गया। सन् 1830 से 1845 के बीच नागपुर और छत्तीसगढ़ का शासन एक बार फिर मराठों के हाथ में आया परन्तु अंत में ब्रिटिश सरकार ने मराठों को हराकर इसे अपने हिस्से का राज्य बना लिया। अंग्रेजों के शासनकाल में अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ विद्रोह के बीज छत्तीसगढ़ में भी प्रस्फुटित हुए। माना जाता है कि वीरनारायण सिंह छत्तीसगढ़ के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्होने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया।
 
 
अंग्रेजों के शासनकाल में छत्तीसगढ़ सेन्ट्रल प्रोविन्स एवं बरार राज्य का हिस्सा था। देश के आजाद होने पर राज्य पुनर्गठन होने पर यह मध्यप्रदेश का हिस्सा बना। छठवीं सदी ईसवी से बारहवीं सदी ईस्वी के मध्य तक इस क्षेत्र में प्रमुख रूप से शुरभपुरीय, पाण्डुवंशी, सोमवंशी, कलचुरि तथा नागवंश के शासकों का आधपत्य रहा। इन शासकों के अभिलेख, ताम्रपत्र, सिक्के, विविध प्रकार के लघु पुरावशेष और स्थापत्य
 
कला के अवशेष प्रचुरता से प्राप्त हुए हैं, जिसे तत्कालीन सांस्कृतिक समृद्धि तथा राजनैतिक उत्कर्ष की जानकारी प्राप्त होती है। प्रागैतिहासिक काल के मानव सभ्यता के उषाकाल में छत्तीसगढ़ भी आदिमानवों के संचरण तथा निवास का स्थान रहा। इसके प्रमाण प्रमुख रूप से रायगढ़ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बसनाझर, बोसलदा, ओंगना पहाड़ और राजनांदगांव जिले के चितवाडोंगरी से प्राप्त होते हैं। आदिमानवों द्वारा निर्मित तथा प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के पाषाण उपकरण, महानदी, मांड, कन्हार, मनियारी तथा केलो नदी के तटवर्ती भाग से प्राप्त होते हैं।
सिंघनपुर तथा कबरा पहाड़ के शैलचित्र विविधता तथा शैली के कारण प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों में विशेष रूप से चर्चित हैं। प्रागैतिहासिक काल के अन्य अवशेषों के एकाश्म शवाधान के बहुसंख्यक अवशेष रायपुर और दुर्ग जिले में पाए गए हैं। पुरातत्व के साथ ही यहां की सांस्कृतिक विशिष्टता भी उल्लेखनीय है। कंवर, कमार, बैगा, हल्बा, कोरवा, पांडो, बिरही और बिंझवार आदि आदिवासी जनजातियां और उनकी संस्कृति यहां है।
1941 की जनगणना में छत्तीसगढ़ क्षेत्र बिहार के साथ था ।
1951 की जनगणना में छत्तीसगढ़ क्षेत्र सीपीएंड बरार के साथ था।
सन् 1956 में जब भाषायी आधार पर राज्यों का निर्माण हुआ तब छत्तीसगढ़ी बोली को आधार मानते हुए अलग राज्य बनाने की मांग तत्कालीन विधायक ठाकुर रामकृष्ण सिंह ने विधानसभा में की थी।
सन् 1920 में पं. सुंदरलाल शर्मा द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य की कल्पना।
सन् 1924 में श्री वामनराव लाखे द्वारा छत्तीसगढ़ के लिए पृथक कांग्रेस कमेटी की मांग।
सन् 1966 डा. खूबचंद बघेल की अध्यक्षता में भातृसंघ की स्थापना और छत्तीसगढ़ काव्य पाठ के माध्यम से जनजागरण अभियान।
सन् 1993 में कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में उल्लेख।
18 मार्च 1994 को मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में पृथक छत्तीसगढ़ विषयक शासकीय संकल्प प्रस्तुत और सर्वसम्मति से पारित।
25 मार्च 1998 को लोकसभा चुनाव के पश्चात् दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य गठन का उल्लेख।
1 मई 1998 को मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य गठन विषयक संकल्प पारित।
सन् 1998 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तथा भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में उल्लेख।
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी द्वारा एक आम सभा में घोषणा कि यदि भाजपा सभी 11 लोकसभा क्षेत्रों में विजयी हुई तो राज्य निर्माण।
25 जुलाई 2000 को लोकसभा में 3 नये राज्यों के गठन हेतु विधेयक।
25 जुलाई 2000 को तत्कालीन गृह मंत्री श्री लालकृष्ण आडवानी द्वारा लोकसभा में छत्तीसगढ़ संशोधन विधेयक 2000 प्रस्तुत।
31 जुलाई 2000 को लोकसभा द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य गठन विधेयक पारित।
9 अगस्त 2000 को राज्य सभा द्वारा राज्य सभा सदस्यों की संख्या यथावत रखने के संशोधन के साथ विधेयक पारित। लोकसभा तथा राज्य सभा द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु प्रेषित।
28 अगस्त 2000 को राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर तथा भारत सरकार के राजपत्र में अधिनियम संख्या 28 के रूप में अधिसूचित।
छत्तीस गढ़ों के बीच सुरक्षित, विकास की अदम्य आकांक्षा को दर्शाता गोलाकार चिन्ह, जिसके मध्य में भारत का प्रतीक अशोक स्तम्भ, आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’, राज्य की प्रमुख फसल धान की सुनहरी बालियां, भरपूर ऊर्जा के प्रतीकों के बीच राष्ट्र ध्वज के तीन रंगों के साथ छत्तीसगढ़ की नदियों को रेखांकित करती लहरें ।